
वह ख़त, जिसके जवाब की कोई समय-सीमा नहीं
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सिंगल2026.07.15
“वह ख़त, जिसके जवाब की कोई समय-सीमा नहीं” की कहानी मेज़ की दराज़ में मिले उस पत्र से शुरू होती है, जिसे दस साल पहले के अपने रूप ने भविष्य के अपने रूप के नाम लिखा था।
उसमें “क्या तुम्हारे सपने पूरे हुए?” और “क्या तुम खुश हो पाए?” जैसे सीधे और निष्कपट सवाल रह गए थे। अपनी कल्पना के भविष्य से अलग वर्तमान के सामने खड़ा नायक, अधूरे सपनों और लंबी घुमावदार राहों में बीते दिनों को फिर से देखता है और अपने ढंग से जवाब लिखना शुरू करता है।
R&B की गर्मजोशी भरी लय को ऐसे आधुनिक J-POP के साथ जोड़ा गया है जिसमें भावनाएँ पूरे विस्तार से उभरती हैं। यह गीत अतीत के खुद को दोष देने के बजाय आज तक का सफ़र तय कर चुके खुद को स्वीकार करने और एक बार फिर भविष्य की ओर बढ़ने की कोशिश को चित्रित करता है।
यह उन लोगों के दिल के पास चुपचाप बैठता है जो अपने सपनों को लेकर भटक रहे हैं, या जिन्हें लगता है कि केवल वे ही पीछे छूट गए हैं।
गीत (जापानी)
机の奥で 色褪せた
十年前の 青い封筒
丸い文字で「未来の僕へ」
「夢はちゃんと叶いましたか」
笑えるほどに まっすぐで
逃げ場もなくて 息を止めた
叶えたものより 諦めた
名前ばかりが浮かんでた
でも破れた 靴の底には
逃げずに歩いた跡がある
見せられない傷の数だけ
今日まで僕を運んできた
返信期限のない手紙に
今の僕を全部書くよ
約束どおりじゃなくていい
ここまで生きてこられたよ
夢を叶えたとは言えない
だけど夢を捨ててもいない
あの日の僕が泣かないように
もう一度 歩き出すよ
赤いペンで 書いては消した
言い訳ばかり 並ぶ余白
守れなかった約束より
守ってきたものを数えた
眠れない夜も 朝になり
笑えない日も 息をしてた
誰にも褒められないまま
それでも僕は ここにいる
勝ち負けだけで測れない
命の重さを今は知る
遠回りしたこの足で
やっとあの日に帰ってきた
返信期限のない手紙に
震える文字で返事を書く
負けた日々まで抱きしめて
僕は僕を許してゆく
「ねえ 幸せになれましたか」
その一行が 滲んでる
幸せかどうかは分からない
でも生きたいと 今は言える
返信期限のない手紙に
今日の僕を全部書くよ
約束どおりじゃなくていい
生きてここまで来たんだ
夢を叶えたとは言えない
だけど僕は終わっていない
あの日の僕よ 待たせたね
ここから一緒に行こう
封をしないで 窓を開ける
返事はこれから 続いてく
अनुवाद
मेज़ की दराज़ में पड़ा, रंग उड़ा हुआ
दस साल पुराना नीला लिफ़ाफ़ा
गोल अक्षरों में लिखा था, “भविष्य के मेरे नाम”
“क्या तुम्हारे सपने सच में पूरे हुए?”
इतनी सीधी बात कि हँसी आ जाए
बचने की राह न मिली, तो साँस रोक ली
जो पाया, उससे अधिक उन चीज़ों के
नाम याद आए जिन्हें छोड़ दिया था
मगर घिसे हुए जूते के तलवे पर
उस राह के निशान हैं जिससे मैं भागा नहीं
हर वह घाव जिसे दिखा नहीं सकता
मुझे आज तक उठाकर यहाँ लाया है
उस ख़त में, जिसके जवाब की कोई समय-सीमा नहीं
आज का अपना पूरा सच लिखूँगा
वादे के मुताबिक़ न हो, तो भी ठीक है
मैं ज़िंदा रहकर यहाँ तक पहुँच सका हूँ
नहीं कह सकता कि सपना पूरा कर लिया
मगर मैंने सपना छोड़ा भी नहीं
ताकि उस दिन वाला मैं रो न पड़े
मैं एक बार फिर चल पड़ूँगा
लाल कलम से लिखा, फिर मिटाया
खाली जगह में बस बहाने भरते गए
जो वादे निभा न सका, उनसे अधिक
उन चीज़ों को गिना जिन्हें सँभाले रखा
नींद-रहित रातें भी सुबह बन गईं
जिन दिनों हँस न सका, तब भी साँस लेता रहा
किसी से कोई तारीफ़ पाए बिना
फिर भी मैं यहाँ मौजूद हूँ
सब कुछ जीत और हार से नहीं मापा जाता
अब मैं जीवन का भार जानता हूँ
इन्हीं पैरों से, जो लंबा चक्कर काटते रहे
आख़िर उस पुराने दिन तक लौट आया हूँ
उस ख़त में, जिसके जवाब की कोई समय-सीमा नहीं
काँपते अक्षरों में जवाब लिखता हूँ
हारे हुए दिनों को भी गले लगाकर
मैं खुद को माफ़ करना सीख रहा हूँ
“बताओ, क्या तुम खुश हो पाए?”
वह एक पंक्ति आँसुओं में धुँधली है
नहीं जानता कि मैं खुश हूँ या नहीं
मगर अब कह सकता हूँ कि जीना चाहता हूँ
उस ख़त में, जिसके जवाब की कोई समय-सीमा नहीं
आज का अपना पूरा सच लिखूँगा
वादे के मुताबिक़ न हो, तो भी ठीक है
मैं जीकर यहाँ तक आया हूँ
नहीं कह सकता कि सपना पूरा कर लिया
मगर मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई
उस दिन वाले मेरे रूप, मैंने तुम्हें बहुत इंतज़ार कराया
अब यहाँ से साथ चलें
लिफ़ाफ़ा बंद किए बिना खिड़की खोलता हूँ
मेरा जवाब आगे भी लिखा जाता रहेगा